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एक्यूप्रेशर का इतिहास, सिद्धांत एवं कार्यप्रणाली

महान चिंतक एवं लेखक डॉक्टर जॉनसन ने कहा है – “To preserve Health is moral and Religious duty, for health is the Basis of all social virtues – We can no longer be useful when not well” अर्थात स्वास्थ्य को बनाए रखना एक नैतिक एवं धार्मिक कर्तव्य है क्योंकि स्वास्थ्य ही सब सामाजिक सद्गुणों का आधार है- रोग की अवस्था में हम उपयोगी नहीं रह पाते। इसी आशय की संस्कृत के भी एक प्रसिद्ध उक्ति है। “शरीरमाघ्यं खलु धर्मसाधनम”। अत: स्वास्थ्य को बनाए रखना जहाँ व्यक्ति के निजी तथा पारिवारिक हित में है वहाँ समाज तथा देश के लिए भी लाभकारी है।
कोई भी व्यक्ति अवस्वथ नहीं रहना चाहता पर सोचने की बात यह है कि मनुष्य रोगी क्यों होता है? रोग होने के दो प्रमुख कारण हैं – पहली अवस्था में मनुष्य अपनी लापरवाही, गलत रहन-सहन, अस्वच्छता, असंतुलित आहार, हानिकारक पदार्थो का सेवन, चिंता, मानसिक तनाव तथा व्यायाम-हीनता के कारण रोगी होता है। दूसरी अवस्था अपनी लापरवाही के कारण नहीं अपितु दूषित वातावरण, संक्रमण, चोट आदि लगने, बुढ़ापा आने तथा कुछ पैतृक त्रुटियों के कारण रोगी होता है। जो मूलरूप से उसकी अपनी समर्थता से बाहर होता है। शरीर को प्रत्येक आयु में और प्रत्येक परिस्थिति में पूर्णरूप से निरोग रखना कठिन कार्य है क्योंकि शरीर तो रोगों का घर है – ‘शरीरं व्याधि मंदिर’। रोग की अवस्था में किसी न किसी चिकित्सा पद्धति का सहारा लेना पड़ता है।
जब से मनुष्यता का सभ्य समाज के रूप में विकास हुआ है तब ही चिकित्सक लगातार इस कोशिश में हैं कि अधिक से अधिक प्रभावशाली चिकित्सा पद्धतियों तथा औषधियों की खोज की जाए ताकि मनुष्य लम्बे समय तक निरोग रह सके और अगर रोगग्रस्त हो भी जाए तो शीघ्र स्वस्थ हो सके।

History, Theory and Working of Acupressure

एक्यूप्रेशर - प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति

पुरातन काल से लेकर आधुनिक समय तक शरीर के अनेक रोगों तथा विकारों को दूर करने के लिए जितनी चिकित्सा पद्धतिया प्रचलित हुई हैं उनमें एक्यूप्रेशर सबसे पुरानी तथा सबसे अधिक प्रभावसाली पद्धति है। इतना अवश्य है की प्राचीन समय से अब तक इसका कोई नाम नहीं रहा है। विभिन्न देशों में विभिन्न समय में इस पद्धति को कई नाम दिए गए। ये पद्धति इसलिए अधिक प्रभावी है क्योंकि इसका सिद्धांत पूर्णरूप से प्राकृतिक है। इस पद्धति की एक अन्य खूबी यह है कि प्रेशर द्वारा इलाज बिलकुल सुरक्षित (safe) होता है तथा इसमें किसी प्रकार के नुकसान (side effect) का बिलकुल डर नहीं है। एक्यूप्रेशर पद्धति के अनुसार समस्त रोगों को दूर करने की शक्ति शरीर में हमेशा मौजूद रहती है पर इस कुदरती शक्ति को रोग निवारण के लिए सक्रिय करने की आवशयकता होती है।
एक्यूप्रेशर पद्धति कितनी पुरानी है तथा इसका किस देश में अविष्कार हुआ, इस बारे में अलग अलग मत हैं। ऐसा विचार है की एक्यूप्रेशर जिसकी कार्य-विधि एवं प्रभाव एक्यूपंक्चर तुल्य है, का अविष्कार लगभग 6000 वर्ष पूर्व भारतवर्ष में ही हुआ था। आयुर्वेद की पुरातन पुस्तकों में देश में प्रचलित एक्यूपंक्चर पद्धति का वर्णन है। प्राचीन काल में चीन से जो यात्री भारतवर्ष आए, उनके द्वारा इस पद्धति का ज्ञान चीन में पहुँचा जहाँ यह पद्धति काफी प्रचलित हुई। चीन के चिकित्सकों ने इस पद्धति के आश्चर्यजनक प्रभाव को देखते हुए इसे व्यापक तौर पर अपनाया और इसको अधिक लोकप्रिय तथा समृद्ध बनाने के लिए काफी प्रयास किया। यही कारण है कि आज सारे संसार में यह चीनी चिकित्सया पद्धति के नाम से मशहूर है।
डॉक्टर आशिमा चैटर्जी, भूतपूर्व एम पी, ने 2 जुलाई, 1982 को राज्य सभा में यह रहस्योद्घाटन करते हुए कहा था कि एक्यूपंक्चर का अविष्कार चीन में नहीं अपितु भारतवर्ष में हुआ था। इस प्रकार 10 अगस्त, 1984 को चीन में एक्यूपंक्चर संबन्धी हुई राष्ट्रिय गोष्ठी में बोलते हुए भारतीय एक्यूपंक्चर संस्था के संचालक डॉ पी के सिंह ने तथ्यों सहित यह प्रमाणित करने की कोशिश की थी कि एक्यूपंक्चर का अविष्कार निश्चय ही भारतवर्ष में हुआ था।
समय के साथ जहाँ इस पद्धति का चीन में काफी प्रचार बढ़ा, भारतवर्ष में यह पद्धति लगभग अलोप ही हो गयी। इसके कई प्रमुख कारण थे। विदेशी शासन के कारण जहाँ भारतवासियों के समाजिक, धार्मिक तथा राजनितिक जीवन में काफी परिवर्तन आया यहाँ सरकारी मान्यता के आभाव के कारण एक्यूप्रेशर सहित कई अन्य प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियाँ प्रफुलिलत नहीं हो सकी।
एक्यूप्रेशर पद्धति जिसका आधार प्रेशर या गहरी मालिश है, के संबंध में प्राचीन भारतीय चिकित्स्कों जिसमें चरक का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है तथा यूनान, मिस्र, तुर्की तथा रोम के कई प्राचीन चिकित्स्कों ने भी अनेक शारीरक एवं मानसिक रोगों को दूर करने,रक्त संचार को ठीक करने, मांसपेशियों को सशक्त बनाने तथा सम्पूर्ण शरीर विशेषकर मस्तिष्क तथा चित को शांत रखने के लिए गहरी मालिश अर्थात एक्यूप्रेशर की सिफारिश की थी। कहते हैं की जूलियस सीजर जो नाड़ी रोगों से पीड़ित था, मालिश से ही ठीक हुआ था। इन चिकित्सको का यह विचार था की दबाव के साथ मालिश करने से रक्त का संचार ठीक हो जाता है जिस कारण शरीर की शक्ति और स्फूर्ति बढ़ जाती है। शरीर की शक्ति बढ़ने से विभिन अंगो में जमा हुए अवंधनिया तथा विषपूर्ण पदार्थ पसीने, मूत्र तथा मल द्वारा शरीर से बाहर चले जाते हैं। जिस से शरीर निरोग हो जाता है। एक्यूप्रेशर या गहरी मालिश साधारण प्रकार की मालिश नहीं है। एक्यूप्रेशर का मतलब है – पैरों, हाथों, चेहरे तथा शरीर के कुछ खास केंद्रों पर दबाव डालना। इन केंद्रों को रिस्पॉन्स सेंटर (Response Centers) या रेफ़्लेक्स सैंटर (रिफ्लेक्स Centres) कहते हैं। हिंदी में इन्हें प्रतिबिम्ब केंद्र कह सकते हैं। रोग की अवस्था में इन केंद्रों पर प्रेशर देने से काफी दर्द होता है क्योंकि तब ये बहुत ही नाजुक (High Sensitive) होते हैं। प्रत्येक रिस्पांस केंद्र का पैरों, हाथों तथा चेहरे पर लगभग मटर के दाने जितना आकर होता है। प्रत्येक रिस्पांस केंद्र को दबाने से शरीर में रोग की प्रतिक्रिया शक्ति जागृत होती है। यही शक्ति वास्तव में रोग दूर करती है।
यद्यपि आधुनिक युग में चिकित्सा के क्षेत्र में कई नई पद्धतियाँ प्रचलित हो गई है पर चीन में एक्यूपंक्चर तथा एक्यूप्रेशर काफी लोकप्रिय पद्धतियाँ हैं। गत कुछ वर्षो में चीन से इस पद्धति का ज्ञान संसार के अनेक देशों में पहुँचा है। भारत सहित कई देशों के चिकित्सक इस पद्धति का ज्ञान चीन से प्राप्त करके आए हैं।
ऐसा अनुमान यही कि छठी शताब्दी में इस पद्धति का ज्ञान सम्भवत: बौध्द भिक्षुओ द्वारा चीन से जापान में पहुँचा। जापान में इस पद्धति को शिआत्सु (shiatsu) कहते हैं। शिआत्सु जापानी भाषा का शब्द है जो दो अक्षरों SHI – शि – अँगुली (Finger) तथा आत्सु ATSU अर्थात दबाव (Pressure) से बना है। शिआत्सु पद्धति के अनुसार केवल हाथों के अँगूठो अथवा उँगलियों के साथ ही वभिन्न ‘शिआत्सु’ केंद्रों पर प्रेशर दिया जाता है। कहते हैं कि इस समय जापान में 20,000 से अधिक मान्यता प्राप्त शिआत्सु चिकित्स्क हैं। डॉ स्टेफनी रिक (The Reflexology Workout) के अनुसार योरोप में लगभग 6,००० से अधिक डॉक्टर, नर्स तथा प्राकृतिक चिकित्सक एक्यूप्रेशर से भी रोगियों का उपचार कर रहे हैं।
एक्यूप्रेशर के चमत्कारी प्रभाव को देखते हुए अमरीका, कैनेडा, इंग्लैंड तथा जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी अब यह पद्धति काफी प्रचलित एवं लोकप्रिय हो रही है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कई दूसरी चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सकों ने भी एक्यूप्रेशर में काफी रूचि लेनी सुरु कर दी है। अनेक रोगों में एक्यूप्रेशर बिना दवा तथा बिना ऑपरेशन के रोग निवारण की प्रभावसाली विधि है। इस पद्धति की एक अन्य विशेषता यह है की इसके द्वारा केवल अनेक रोगों का इलाज नहीं किया जाता अपितु अनेक रोगों को दूर भी रखा जा सकता है जिसे रोगों निरोधक उपाय (Preventive Treatment) कहते हैं। इस तरह इस पद्धति को व्यापक तौर पर अपनाने से जहाँ लाखो लोग अपना स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं उसके साथ अपने तथा राष्ट्र के करोड़ो रुपये की बचत भी क्र सकते हैं जोकि प्रतिवर्ष स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाते हैं।

एक्यूप्रेशर तथा एक्यूपंक्चर में अंतर

एक्यूप्रेशर दो शब्दों Acus – Pressure से बना है। Acus लैटिन का शब्द है जिसका अर्थ सुई तथा Pressure अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ दबाव डालना है। व्यापारिक रूप में एक्यूप्रेशर का अभिप्राय सुइयों द्वारा इलाज से नहीं है। सुइयों द्वारा इलाज का नाम एक्यूपंक्चर है। यद्यपि प्रचलित रूप में एक्यूप्रेशर तथा एक्यूपंक्चर दोनों ही पद्धति मानी जाती हैं तथा दोनों एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं उप इनमें मुख्यत: यह अन्तर है कि एक्यूपंक्चर में रोग निवारण के लिए सुइयों का प्रयोग किया जाता है अर्थात एक विशेष प्रकार की सुइया एक खास ढंग से शरीर के कई भागों पर लगाई जाती है। एक्यूप्रेशर पद्धति में सुइयों की बजाए हाथों के अंगूठों, उँगलियों या किन्हीं उपकरणों से रोग से सम्बन्धी केंद्रों पर दबाव डाला जाता है जिसे प्रेशर, डीप मसाज या गहरी मालिश कहते हैं। शरीर के विभिन्न अंगों से सम्बंधित ये केंद्र हाथों, पैरों, चेहरे तथा कानों पर स्थित हैं जिसकी फोटो में दर्शाया गया है। रीढ़ की हड्ड़ी के साथ-साथ तथा शरीर के कई अन्य भागों पर भी अनेक एक्यूप्रेशर केंद्र हैं।

इन फोटोज में केवल उन्हीं केंद्रों को दर्शाया गया है जिन्हें प्रमुख रिफ्लेक्स केंद्र कहा जा सकता है। इन केन्द्रों की पहचान एवं जाँच प्रत्येक व्यक्ति आसानी से कर सकता है। वैसे तो चीनी चिकित्सकों ने सारे शरीर पर सैंकड़ों एक्यूप्रेशर केन्द्रों का पता लगाया है लेकिन उन सब केन्द्रों की पहचान करना एक साधारण व्यक्ति के लिए कठिन कार्य है सामान्य रोगों के उपचार के लिए इन सब केन्द्रों की पहचान करना जरूरी भी नहीं है। केवल पैरों, हाथों, चेहरे, कानों, पीठ तथा शरीर के कुछ भागों पर प्रमुख केन्द्रों पर प्रेशर डालने से ही सारे रोगों को दूर किया जा सकता है। जैसाकि पहले बताया गया है पैरों, हाथों, चेहरे, तथा कानों पर लगभग एक जैसे एक्यूप्रेशर केंद्र हैं पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा में पैरों का प्रथम स्थान है। पैरों में प्रतिबिम्ब केन्द्रों की ठीक जाँच हो जाने और ठीक प्रेशर देने के कारण सारे रोग शीघ्र दूर हो जाते हैं। जाँच तथा प्रभाव के सम्बन्ध में दूसरा नम्बर हाथों के प्रतिबिम्ब केन्द्रों भी काफी महत्वपूर्ण हैं। अच्छा तो यह है कि रोग की अवस्था में पैरों, हाथों, चेहरें, कानों तथा पीठ पर स्थित रोग से सम्बंधित एक से अधिक प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर प्रेशर दिया जाए। ऐसा करने से काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है और रोग शीघ्र दूर हो जाता है। चेहरे तथा कानों पर विभिन्न एक्यूप्रेशर केन्द्रों पर प्रेशर हाथों के अँगूठो या उंगलियों के साथ देना चाहिए और वह भी धीरे-धीरे तथा हल्का देना चाहिए। इन केन्द्रों पर किसी प्रकार के किसी उपकरण का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

5 comments

    Great…..Very Knowledgeable Contant

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